जब सवाल पूछने वाले ही विषय बन जाएं

सवाल शिक्षा स्वास्थ्य पेपर लीक भृष्टाचार से हट कर पत्रकार पर आ टिकें तो समझिए राजनीति जीत चुकी है। अब विषय सवाल पूछने वाले ही बन गए हैं। दिल्ली में हो रहे प्रदर्शन से आइ तश्वीरों पर वरिष्ठ पत्रकार अनुराग व्दारे का लेख

पहले सवाल बच्चों की पढ़ाई, परीक्षाओं और पर्चे लीक होने का था, अब निष्पक्ष चुनाव का है लेकिन इन सवालों के साथ दिल्ली पहुंचे लोगों की अपनी फिक्र है, वहां रहने वालों की काम करने वालों की अपनी।

लेकिन बहस का एक हिस्सा इस पर अटक गया है कि कौन-सा पत्रकार किस तरफ है, किसे घेरा गया और किसके समर्थन में कौन खड़ा हुआ।

जिसे सवाल पूछना था, वो विषय बन गया… जिसका सवाल था, वो कैमरे के पीछे छूट गया। दिल्ली पहुंचे लोगों के पास अपनी शिकायतें थीं, हम उन्हें सुनने गए थे कुछ देर बाद बहस होने लगी कि हमें कौन सुन रहा है, कौन नहीं सुन रहा और किसने हमारे साथ क्या किया जिनकी बात बताने गए थे, उनसे कहना पड़ा होगा ज़रा ठहरिए, अभी हमारी बात चल रही है।

हमारे पेशे में अपना चेहरा दिखाने की सुविधा है, मुश्किल तब होती है, जब हमें हर कहानी में अपना ही चेहरा सबसे ज़रूरी लगने लगता है … आदमी अपनी परेशानी बता रहा होता है और हम तय कर रहे होते हैं कि इस परेशानी के साथ हमारी तस्वीर कैसी आएगी.

पहचान की इतनी खिड़कियां

पत्रकार कौन है, यूट्यूबर कौन, कंटेंट क्रिएटर कौन हमने पहचान की इतनी खिड़कियां खोल ली हैं कि खबर लेकर आया आदमी पूछता रह जाता है, किस पर जाऊं? बड़े चैनल का परिचय गलती को सही नहीं बना देता अकेले मोबाइल लेकर निकले आदमी की सही खबर भी छोटी नहीं हो जाती कंटेंट क्रिएटर, यूट्यूबर और पत्रकार इनकी सीमाओं पर बहुत बहस होती है लेकिन क्या ये वाकई अलग हैं .. क्या परिभाषा है पत्रकार की वही ना जो जनहित की जानकारी जुटाता है, उसकी सत्यता जांचता है, संदर्भ समझता है और ईमानदारी से लोगों तक पहुंचाता है . वो पत्रकारिता कर रहा है … मोबाइल पर भी, बड़े चैनल पर भी माइक पर लगा नाम परिचय दे सकता है, काम की गवाही तो रिपोर्ट ही देगी हमारा काम उस दरवाज़े तक उनकी बात पहुंचाना है वहां अपनी नामपट्टी लगाना नही ?

हम अक्सर कहते हैं कि हम लोगों की आवाज़ हैं .लोगों की अपनी आवाज़ है। किसान बोलता है, मज़दूर बोलता है, परीक्षा रद्द होने पर घर लौटता छात्र भी बोलता है। हमें सुनना है, जांचना है और उनकी बात वहां पहुंचानी है, जहां उसे सुनने की ज़िम्मेदारी है।

पत्रकार पर हमला हो, उसे धमकाया जाए या काम करने से रोका जाए, तो वो भी सार्वजनिक चिंता का विषय है … उसे दर्ज करना आत्मप्रचार नहीं है … किसी की कवरेज से नाराज़गी, उसके साथ मारपीट का अधिकार नहीं देती उसके तथ्य गलत हैं तो तथ्य सामने रखिए भीड़ का हाथ उठने से कोई तर्क सही नहीं हो जाता…

जिस पत्रकार से हमारी सबसे गहरी असहमति है, उसकी सुरक्षा के पक्ष में भी उतनी ही साफ़ आवाज़ निकलनी चाहिए … अभिव्यक्ति की आज़ादी पसंदीदा लोगों को बांटने की चीज़ नहीं है  यह बात उस पत्रकार के लिए भी उतनी ही साफ़ होनी चाहिए, जिसे हम पसंद नहीं करते  अपने पक्ष के आदमी को चोट लगे तो लोकतंत्र घायल हो और दूसरे को लगे तो पहले उसका पुराना वीडियो खोजने बैठ जाएं

हमारी संवेदना भी फिर सदस्यता देखकर सेवा दे रही है 

उधर पत्रकार को भी आलोचना और उत्पीड़न का फर्क रखना होगा हर असहज सवाल हमला नहीं होता … दूसरों से जवाब मांगने का काम चुना है तो अपने जवाब की तैयारी भी रखनी चाहिए …

हां ये आज़ादी संविधान में निरपेक्ष नहीं है … ये बात सबको समझनी चाहिये … अनुच्छेद 19(1)(क), (ख) और (ग) अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा तथा संगठन बनाने के अधिकार देते हैं … इनके साथ संविधानसम्मत युक्तियुक्त प्रतिबंधों का प्रावधान भी है…

ये बात पत्रकार, प्रदर्शनकारी और सरकार … तीनों के लिए है … किसी को मनमानी का पट्टा नहीं मिला है

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