दशहरा चल समारोह में भक्ति पर भारी पड़ा डीजे का शोर

दशहरा चल समारोह में डीजे का क्रेज चरम पर, तेज आवाज और फूहड़ गानों के बीच भक्ति के स्वर पड़े फीके; दुकानों में सामान बिखरा मिलने की जानकारी सामने आई है।

निवास। मां दुर्गा की आराधना में नौ दिनों तक श्रद्धा और भक्ति के साथ उपवास रखने वाले श्रद्धालु जब मां की विदाई के लिए निकलते हैं, तो क्या उस अवसर पर फूहड़ गानों और कानफोड़ू डीजे की धुन पर थिरकना उचित है? यह सवाल अब धार्मिक आयोजनों में बढ़ते डीजे के चलन और बदलते भक्ति प्रदर्शन के तरीकों को लेकर उठने लगा है। मंडला जिले के निवास सहित ग्रामीण क्षेत्रों में दशहरा चल समारोह के दौरान डीजे को लेकर युवाओं में जिस तरह का उत्साह देखने को मिला, उसने धार्मिक आयोजनों की गरिमा और सामाजिक जिम्मेदारी पर बहस छेड़ दी है।

भक्ति के गीतों की जगह फिल्मी गानों का शोर

दुर्गा प्रतिमाओं की विदाई के दौरान ‘चढ़ती जवानी मेरी’, ‘हुड़ हुड़ दबंग’ और ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए’ जैसे फिल्मी गानों पर नाचते युवाओं को देखकर सवाल उठता है कि क्या यही मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करने का तरीका रह गया है? नौ दिनों तक मां की पूजा-अर्चना करने के बाद विदाई के समय यदि धार्मिक गीतों और पारंपरिक भजनों की जगह ऐसे गाने प्रमुख हो जाएं, तो धार्मिक आयोजनों के मूल उद्देश्य पर विचार करना जरूरी हो जाता है।

यह सवाल युवाओं के नाचने या उत्सव मनाने के विरोध का नहीं, बल्कि धार्मिक अवसरों पर गीतों के चयन, ध्वनि की मर्यादा और आयोजन की गरिमा बनाए रखने का है।

गांव-गांव में डीजे का बढ़ता क्रेज

मंडला जिले के ग्रामीण इलाकों में डीजे को लेकर युवाओं का आकर्षण इस कदर बढ़ता दिखाई दे रहा है कि इसकी तुलना नब्बे के दशक में गांवों में टीवी और वीसीआर देखने के उत्साह से भी की जाने लगी है। तहसील मुख्यालयों से लेकर छोटे-छोटे गांवों तक डीजे अब धार्मिक जुलूसों का प्रमुख आकर्षण बनता जा रहा है।

तेज धमक, भारी बेस और ऊंची आवाज वाले साउंड सिस्टम के बीच युवाओं का उत्साह कई बार इस हद तक पहुंच जाता है कि धार्मिक आयोजन का मूल उद्देश्य पीछे छूटता नजर आता है। आज डीजे पर नाचते हुए वीडियो और रील बनाना भी युवाओं के लिए समारोह का अहम हिस्सा बन गया है। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की लोकप्रियता ने इस चलन को और बढ़ावा दिया है।

डीजे बजाने वाले भइया किसी हीरो से कम नहीं है सौ पचास तो खाली इन्हें देखने के लिए ही एकत्रित हो जाते हैं।

दशहरा चल समारोह में डीजे का मुकाबला

निवास के दशहरा चल समारोह में भी डीजे के प्रति यही दीवानगी देखने को मिली। नगर की विभिन्न सार्वजनिक दुर्गा उत्सव समितियों के बीच बेहतर और आकर्षक डीजे साउंड सिस्टम रखने की होड़ नजर आई। इसके पीछे आसपास के गांवों से आने वाले युवाओं और युवतियों को अपनी झांकी की ओर आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा भी एक वजह मानी जा रही है।

बताया गया कि आसपास के करीब 20 किलोमीटर के क्षेत्र से बड़ी संख्या में युवा समारोह में पहुंचे। लगभग 500 मीटर के दायरे में आधा दर्जन डीजे साउंड सिस्टम बजने से ध्वनि का दबाव काफी बढ़ गया। अलग-अलग डीजे से निकलने वाली तेज आवाज और भारी बेस के बीच वहां का माहौल कैसा रहा होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। आसपास के घरों में मौजूद लोगों को इस शोर का सामना करना पड़ा।

आस्था के उत्सव में मर्यादा भी जरूरी

दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत और मां दुर्गा की शक्ति के सम्मान का पर्व है। ऐसे अवसरों पर उत्साह और उल्लास स्वाभाविक हैं, लेकिन उत्सव की आड़ में धार्मिक मर्यादा, सामाजिक जिम्मेदारी और दूसरों की सुविधा की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

डीजे और आधुनिक साउंड सिस्टम अपने आप में समस्या नहीं हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब तेज आवाज, फूहड़ गानों और एक-दूसरे से आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा में धार्मिक आयोजन की भावना पीछे छूटने लगती है। हालांकि एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि समय बदल चुका है अब नए बदलाव को स्वीकार करना चाहिए

अब जरूरत इस बात की है कि दुर्गा उत्सव समितियां, प्रशासन और समाज मिलकर ऐसे आयोजनों को मर्यादित, सुरक्षित और श्रद्धापूर्ण बनाने की दिशा में पहल करें। मां दुर्गा की विदाई का अवसर केवल शोर और प्रदर्शन का नहीं, बल्कि श्रद्धा, संस्कार और सामाजिक सद्भाव का भी होना चाहिए।

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