जनसेवा या सोशल मीडिया शो ? अब ढोल-नगाड़े और डांस से चलेगी राजनीति!

बीते कुछ वर्षों में जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कभी जनता की समस्याओं को लेकर सड़क से लेकर सदन तक संघर्ष करने वाले नेता अब सोशल मीडिया की चमक-दमक में ज्यादा सक्रिय नजर आने लगे हैं। धरना-प्रदर्शन, जनआंदोलन और भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर आवाजें अब धीरे-धीरे गौण होती जा रही हैं।

विधानसभा और परिषदों में भी अब वही सवाल अधिक सुनाई देते हैं, जिनसे सत्ता पक्ष कम और स्थानीय अधिकारी ज्यादा असहज हों। बड़े भ्रष्टाचार, अधूरे विकास कार्य और जनता की मूलभूत समस्याओं पर खामोशी कई सवाल खड़े करती है।

इस बीच सोशल मीडिया पर जनप्रतिनिधियों का एक नया रूप तेजी से उभरा है। कोई ढोलक बजाते दिखाई देता है, कोई मंच पर थिरकते हुए वायरल हो रहा है, तो कोई रील और वीडियो के जरिए खुद को “जमीन से जुड़ा” साबित करने में जुटा है।

विडंबना यह है कि जिन क्षेत्रों में सड़क, पानी, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं, वहां जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताएं बदलती दिखाई दे रही हैं। जनता परेशान है, लेकिन कैमरे के सामने मुस्कान और मंच पर डांस जारी है।

ऐसा लगता है मानो अब राजनीति में जनसेवा का पैमाना बदल चुका है। क्षेत्र की समस्याओं पर संघर्ष करने के बजाय सोशल मीडिया पर सक्रिय दिखना ज्यादा जरूरी हो गया है। सवाल यह है कि जनता ने अपने प्रतिनिधि विकास और जवाबदेही के लिए चुने थे या मनोरंजन के लिए?

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