दिवाली आते ही आसमान रंग-बिरंगी रोशनी और आतिशबाजी से जगमगा उठता है। पटाखे फोड़ना आज कई लोगों के लिए त्योहार का हिस्सा बन चुका है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत में पटाखे चलाने की शुरुआत कब और कैसे हुई? क्या दिवाली पर पटाखे फोड़ने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है, या इसका इतिहास कुछ सदियों पुराना है?
ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि भारत में आतिशबाजी का इतिहास कई सदियों पुराना है, लेकिन दिवाली पर पटाखे चलाने का प्रचलन इससे अलग और अपेक्षाकृत नया है।
चीन से भारत पहुंची बारूद की तकनीक
बारूद का आविष्कार चीन में हुआ था। समय के साथ बारूद और उससे जुड़ी तकनीक दूसरे देशों तक पहुंची। भारत में 13वीं शताब्दी तक युद्धों में बारूद के इस्तेमाल के प्रमाण मिलने लगते हैं। इतिहासकार इक्तिदार आलम खान ने भारत में बारूद और आग्नेयास्त्रों के इतिहास पर विस्तार से शोध किया है।
हालांकि, बारूद का युद्धों में इस्तेमाल और मनोरंजन के लिए आतिशबाजी करना दो अलग-अलग बातें हैं।
मुगल काल से पहले भी भारत में होती थी आतिशबाजी
भारत में आतिशबाजी की परंपरा को केवल मुगल काल से जोड़ना सही नहीं होगा। इसके प्रमाण मुगल साम्राज्य की स्थापना से पहले भी मिलते हैं।
1443 ईस्वी में विजयनगर साम्राज्य पहुंचे फारसी राजदूत अब्दुर रज्जाक ने वहां के महानवमी उत्सव का वर्णन किया था। उनके विवरण में आतिशबाजी का भी उल्लेख मिलता है।
इसी तरह 15वीं शताब्दी में कश्मीर में भी आतिशबाजी के इस्तेमाल के प्रमाण सामने आते हैं।
ओडिशा के गजपति राजा प्रतापरुद्रदेव के शासनकाल से संबंधित संस्कृत ग्रंथ ‘कौतुकचिंतामणि’ में भी आतिशबाजी बनाने से जुड़ी जानकारियां मिलती हैं।
मुगल दरबार और शाही समारोहों में आतिशबाजी
मुगल काल में आतिशबाजी शाही समारोहों, विवाह और उत्सवों का हिस्सा बनी। मुगल राजकुमार दारा शिकोह का विवाह वर्ष 1633 में हुआ था। इस विवाह से जुड़े चित्रों और ऐतिहासिक विवरणों में भव्य समारोहों का उल्लेख मिलता है।
पुर्तगाली यात्री द्वारते बारबोसा ने भी 16वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में गुजरात में एक ब्राह्मण विवाह के दौरान आतिशबाजी, बम और रॉकेट जैसी चीजों के इस्तेमाल का वर्णन किया था।
इससे स्पष्ट होता है कि उस समय आतिशबाजी केवल युद्ध तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामाजिक और शाही आयोजनों में भी इसका इस्तेमाल होने लगा था।
दिवाली पर पटाखे चलाने की परंपरा कब शुरू हुई?
यह इस पूरे इतिहास का सबसे दिलचस्प सवाल है।भारत में आतिशबाजी का इस्तेमाल सदियों पहले से होता रहा, लेकिन दिवाली पर पटाखे चलाने की परंपरा के प्रमाण अपेक्षाकृत बाद के समय में मिलते हैं।
इतिहासकार पी.के. गोड़े के शोध के अनुसार, दिवाली के अवसर पर आतिशबाजी के इस्तेमाल के लिखित प्रमाण 18वीं शताब्दी के मध्य के आसपास पेशवा काल में मिलते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि इससे पहले किसी ने दिवाली पर पटाखे नहीं चलाए होंगे, बल्कि उपलब्ध ऐतिहासिक लिखित प्रमाणों के आधार पर इस परंपरा का पता लगाया जाता है।
भारत में पटाखों का पहला कारखाना
भारत में पटाखों के निर्माण का इतिहास भी दिलचस्प है। 19वीं शताब्दी में कोलकाता में गोपाल महिन्द्रम् नामक व्यक्ति द्वारा आतिशबाजी निर्माण की शुरुआती यन्त्रशाला स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
बाद में तमिलनाडु का शिवकाशी पटाखा उद्योग के बड़े केंद्र के रूप में विकसित हुआ। आज भी शिवकाशी भारत के आतिशबाजी उद्योग के लिए जाना जाता है।
इतिहास क्या बताता है?
भारत में आतिशबाजी का इतिहास और दिवाली पर पटाखे चलाने की परंपरा को एक ही नहीं माना जा सकता। आतिशबाजी के प्रमाण 15वीं शताब्दी से पहले और बाद के विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों में मिलते हैं, जबकि दिवाली पर पटाखे चलाने के लिखित प्रमाण मुख्यतः 18वीं शताब्दी के आसपास सामने आते हैं।
इसलिए यह कहना कि दिवाली पर पटाखे चलाने की परंपरा हजारों साल पुरानी है, उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों से पुष्ट नहीं होता।

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