जय अंबे गौरी आरती और दुर्गा पूजा के अनसुने तथ्य

रविवार से देशभर में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत के साथ दुर्गा पंडालों में सजावट को अंतिम रूप दिया जा रहा है। मंदिरों और घरों में पूजा-पाठ के बीच मां दुर्गा की आराधना में प्रसिद्ध आरती ‘जय अम्बे गौरी’ भी श्रद्धा के साथ गाई जाती है। लेकिन इस लोकप्रिय आरती के रचनाकार और सार्वजनिक दुर्गा उत्सव के इतिहास से जुड़े कुछ रोचक तथ्य कम ही लोग जानते हैं।

कौन हैं ‘जय अम्बे गौरी’ के रचयिता?

लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, ‘जय अम्बे गौरी’ आरती के रचयिता शिवानंद स्वामी माने जाते हैं। कुछ विवरणों में उनका पूरा नाम शिवानंद वामदेव पांड्या बताया गया है और रचना-वर्ष 1601 दिया गया है।जय अम्बे गौरी’ आरती के अंतिम पद में ‘कहत शिवानंद स्वामी, सुख संपत्ति पावे’ पंक्ति आती है। इसी आधार पर इस आरती की रचना का श्रेय स्वामी शिवानंद को दिया जाता है। हालांकि, उनके जन्म-वर्ष और आरती की रचना-तिथि के संबंध में निर्णायक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

सार्वजनिक दुर्गा पूजा की शुरुआत कब हुई?

बंगाल में दुर्गा पूजा की परंपरा सदियों पुरानी है। शुरुआती दौर में भव्य आयोजन मुख्य रूप से राजघरानों और संपन्न परिवारों तक सीमित थे। पश्चिम बंगाल के हुगली जिले का गुप्तीपाड़ा सामुदायिक पूजा की शुरुआती परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां बारोवारी पूजा की शुरुआत 1761 से 1790, के बीच शुरू हुई थी।

कोलकाता में 1910 में आयोजित सर्वजनिन दुर्गा पूजा का संबंध बलराम बसु घाट रोड से बताया जाता है, जबकि बागबाजार में सामुदायिक दुर्गा पूजा की शुरुआत 1919 में हुई थी।

आजादी के आंदोलन से भी जुड़ा है दुर्गा उत्सव

ब्रिटिश शासन के दौरान मां दुर्गा और भारत माता को एक करके प्रस्तुत करने का काम बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने किया आनंदमठ में शामिल ‘वंदे मातरम्’ जिसमें उन्होंने देश को ‘भारत माता’ के रूप में देखा और उनकी तुलना मां दुर्गा से की।

वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन के दौर में मां दुर्गा को मातृभूमि के प्रतीक के रूप में देखने की भावना मजबूत हुई। पूजा और सामुदायिक आयोजनों ने लोगों के बीच राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में भी भूमिका निभाई।

बंगाल में दुर्गा पूजा ने धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन से आगे बढ़कर सामाजिक एकजुटता तथा राष्ट्रवादी चेतना को मजबूत करने में भूमिका निभाई। विशेषकर बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन के दौरान सामुदायिक आयोजनों का महत्त्व बढ़ा।

यूनेस्को ने भी दी मान्यता

कोलकाता की दुर्गा पूजा को वर्ष 2021 में यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया। यह मान्यता इस उत्सव की सांस्कृतिक महत्ता, सामुदायिक भागीदारी और जीवंत परंपरा को रेखांकित करती है।

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